स्विट्जरलैण्ड के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रेडरिक मीश्चर (Frederick Miesclher) ने कोशिका का रासायनिक विश्लेषण करते समय केन्द्रक से एक श्वेत चूर्ण प्राप्त किया जिसे इन्होंने सन् 1869 में केन्द्रक से प्राप्त होने के कारण न्यूक्लीन की संज्ञा दी। बाद में प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्ट्मैन (Aluman) ने सन् 1899 में इसे न्यूक्लिक अम्ल के नाम से सम्बोधित किया।
यह सभी जीवित कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक वृहद् -अणु है। जो जीवित कोशिकाओं में न्यूक्लिप्रोटीन के रूप में पाया जाता है। न्यूक्लियोप्रोटीन एक प्रकार का संयुग्मी प्रोटीन है, जिसमें न्यूक्लिक अम्ल प्रोस्थेटिक समूह के रूप में भी पाया जाता है। न्यूक्लियोप्रोटीन जल द्वारा अपघटित होकर न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन देता है।
न्यूक्लिक अम्लों को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं-
"न्यूक्लिक अम्ल कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व फॉस्फोरस तत्त्वों से बने न्यूक्लियोटाइड्स के बहुलक (Polymer) अर्थात्पॉ लीन्यूक्लियोटाइड्स हैं जो जीवों की आधारभूत क्रियाओं का नियन्त्रण करते हैं।"
न्यूक्लिक अम्लों की संरचना (SIructure of NucleicAcids) यदि न्यूक्लिक अम्लों का जलीय अपघटन कराया जाए तो इनकी संरचना का स्पष्ट रूप से ज्ञान हो जाता है।
Nucleic Acids का अपघटन निम्नलिखित प्रकार से होता है-
(0) न्यूक्लिक अम्ल पॉलीन्यूक्लियोटाइडेज प्रकिण्व की उपस्थिति में अपघटित होकर न्यूक्लियोटाइड्स देते हैं।
(i) न्यूक्लियोटाइड्स फॉस्फेटेज प्रकिण्व की उपस्थिति में अपघटित होकर न्यूक्लियोसाइड्स और फॉस्फोरिक अम्ल देते हैं।
(i) न्यूक्लियोसाइड्स, न्यूक्लियोसाइडेज प्रकिण्व की उपस्थिति में अपषटित होकर शर्कराएँ और नाइट्रोजनी क्षारक देते हैं। अत: जलीय अपघटन से स्पष्ट है कि न्यूक्लिक अम्ल न्यूक्लियोटाइड्स और न्यूक्लियोटाइड्स फॉस्फोरिक अम्ल, शर्करा तथा नाइट्रोजनी क्षारकों के बने होते हैं।
न्यूक्लिक अम्लों में केवल दो प्रकार की शर्कराएँ राइवोज और डी- ऑक्सीराइबोज पायी जाती है और इन्हीं की उपस्थिति के आधार पर न्यूक्लिक अम्ल भी दो प्रकार के होते हैं जिन्हें DNA तथा RNA कहते है
राइबोज शर्करा वाले न्यूक्लिक अम्लों को RNA तथा डी-ऑक्सीराइबोज शर्करा वाले न्यूक्लिक अम्लों को DNA कहते हैं।